पाठ्यक्रम:GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी
समाचार में
- गूगल अर्थ (Google Earth) में गूगल की AI-आधारित “क्रिएट इमेज” सुविधा जारी होने के 24 घंटे के अंदर ही हटा दी गई।
गूगल अर्थ की AI सुविधा के बारे में
- जुलाई 2026 में गूगल ने अपनी नैनो बनाना (Nano Banana) तकनीक पर आधारित गूगल अर्थ में AI इमेज जनरेशन सुविधा की घोषणा की।
- यह सुविधा उपयोगकर्ताओं को टेक्स्ट प्रॉम्प्ट के आधार पर उपग्रह चित्रों में वस्तुओं को जोड़कर उनमें बदलाव करने की अनुमति देती थी।
- इसका उद्देश्य ऐतिहासिक घटनाओं के पुनर्निर्माण, रियल एस्टेट के नमूना प्रारूप, शैक्षिक इन्फोग्राफिक्स और वास्तुशिल्पीय विज़ुअलाइजेशन जैसे कार्यों में सहायता करना था।
सुविधा हटाने के कारण
- उपयोगकर्ताओं द्वारा ऐसी तस्वीरें तैयार किए जाने के बाद गूगल ने इस सुविधा को वापस ले लिया, जो उसकी नीतियों का उल्लंघन करती प्रतीत हुईं।
- उपयोगकर्ताओं और शोधकर्ताओं ने आतंकवादी हमलों, मानवीय संकटों, औद्योगिक दुर्घटनाओं और पर्यावरणीय विनाश से संबंधित डीपफेक उपग्रह चित्र तैयार किए।
- इस घटना ने यह चिंता बढ़ा दी कि इस सुविधा में वर्तमान सुरक्षा उपायों को बहुत आसानी से दरकिनार किया जा सकता है, जिससे विश्वसनीय प्रतीत होने वाली गलत सूचनाओं के व्यापक प्रसार का मार्ग खुल सकता है।
- तैयार की गई तस्वीरों पर AI-जनित होने का लेबल लगाया गया था और उन्हें गूगल अर्थ के मुख्य अनुभव में प्रदर्शित नहीं किया गया था।
नकली AI-जनित उपग्रह चित्रों के प्रभाव और जोखिम
- गलत सूचना: डीपफेक का उपयोग संघर्षों, आपदाओं, मानवीय संकटों या पर्यावरणीय क्षरण के संबंध में लोगों को गुमराह करने और ऐसी सामग्री को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल करने के लिए किया जा सकता है।
- धोखाधड़ी: भौगोलिक या संपत्ति संबंधी जानकारी में बदलाव किए जाने की स्थिति में रियल एस्टेट धोखाधड़ी संभव हो सकती है।
- कमजोर सुरक्षा: AI वॉटरमार्क को आसानी से हटाया जा सकता है, जिससे सामान्य लोगों के लिए नकली तस्वीरों की पहचान करना कठिन हो जाता है।
- शैक्षणिक एवं अनुसंधान संबंधी विश्वसनीयता: ऐसी तस्वीरें अनुसंधान और वैज्ञानिक पद्धति की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती हैं।
- सुरक्षा संबंधी जोखिम: AI-जनित नकली उपग्रह चित्र सैन्य उपकरणों, सैन्य अड्डों की गतिविधियों और सीमा पर सैन्य तैनाती के संबंध में गलत जानकारी प्रदान करके राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम उत्पन्न कर सकते हैं।
- यह प्रक्रिया महँगी होने के साथ-साथ बहुमूल्य समय और संसाधनों की खपत करती है, लेकिन इससे खुफिया एजेंसियों को जाँच करने तथा संकट की स्थिति में निर्णायक प्रतिक्रिया देने के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है।
आगे की राह
- भौगोलिक-स्थान संबंधी सिंथेटिक मीडिया के खतरे से निपटने के लिए सरकारों को क्रिप्टोग्राफिक वॉटरमार्किंग जैसी सुदृढ़ तकनीकी सुरक्षा व्यवस्थाएँ अनिवार्य करनी चाहिए, ताकि चित्रों की प्रामाणिकता सत्यापित की जा सके।
- इसके साथ ही, साइबर सुरक्षा कानूनों को आधुनिक बनाने की आवश्यकता है, ताकि दुर्भावनापूर्ण जियोस्पेशियल डीपफेक को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष खतरे के रूप में वर्गीकृत किया जा सके।
- रक्षा और खुफिया एजेंसियों को हेरफेर किए गए उपग्रह डेटा और कृत्रिम रूप से तैयार किए गए भू-भाग की शीघ्र पहचान के लिए AI-सक्षम पहचान उपकरणों का उपयोग करना चाहिए।
- युद्ध क्षेत्रों और परमाणु प्रतिष्ठानों जैसे संवेदनशील स्थानों के चित्रों में संशोधन के लिए वैश्विक मानकों की आवश्यकता है।
स्रोत:TH
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संक्षिप्त समाचार 11-08-2026